मत्स्य पालन- सफलता की कहानी

सिवान जिला मत्स्य पालन के दृष्टिकोण से एक समृद्ध जिला है। जहाँ मत्स्य पालन हेतु अनेकों नदीयां नाले, पइन, तालाब, पोखरे, जलाश्य एवं अन्य आद्र भूमि उपलब्ध है। जिले में बरसात हेतु बरसाती पानी एवं नदीयों में अत्यधिक पानी बहाव के साथ आकर नीचले भू-भाग में इक्ट्ठे हो जाने से मत्स्य पालन हेतु उपर्युक्त स्थान का निर्माण हो जाता हैं जिसे बोल-चाल की भाषा में चंवर कहा जाता है, कि बहुतायत है, या यों कहें कि चंवरों की संख्या में पूरे बिहार में सिवान अव्वल स्थान पर है। इन निचले-भूभाग (चंवरों) में पानी का ठहराव अमूमन 3 महीने से पूरे वर्ष (12 महीनों) तक रहता है। जिले के गोरियाकोठी बसंतपुर, भगवानपुर बड़हरिया एवं दरौधा में इसकी अधिकता हैं। इन क्षेत्रों में सैकड़ो एकड़ भूमि चंवर के रूप में उपलब्ध है, र्दुभाग्यवश् इन चंवर भूमि से गरीब किसनों को छटांक भर भी अनाज नहीं प्राप्त होता है और न ही वे इसका उपयोग सघन मत्स्य पालन हेतु किया करते है। फलतः इस जिले की सैकड़ो एकड़ भूमि यूं हि बेकार पड़ी हुई है।
ऐसा ही एक गोरियाकोठी प्रखण्ड का चैनपुर गाॅव है, जहाँ सारण नहर के दोनों और सैकड़ों एकड़ भूमि चंवर के रूप में विद्यमान है, जिसका उपयोग जल जमाव कें वजह से नहीं हो पाता हैं। किसानों को रत्ती भर भी अनाज इस चंवर भूमि से प्राप्त नहीं हो पाता है। करीब से बहने वाली स्थानीय धामती (धमई) नदी के मानसून में उफनाने से पानी का बहाव चैनपुर, शेरपुर एवं अन्य सभी सीमावर्ती गाॅवों से गुजरता है तथा क्षेत्र के निचले भू-भाग में जल फैलाव करते हुए आगे बढ़ जाता हैं। जहां वर्ष के 12 महीने पानी का ठहराव रहता है। इसी गांव के नवजवानें की एक छोटी सी टोली जिसका नेतृत्व नेतरहाट विद्यालय के पूर्व छात्र कुमार राकेश कर रहे थे, ने जिला मत्स्य कार्यालय सिवान का दरवाजा इस संशय के साथ खटखटाया कि क्या इस सैकड़ो एकड़ जलजमाव वाले क्षेत्र में मत्स्य पालन की कुछ संभावनाएं है या नहीं ? संशंकित मन को एक उल्लास एवं उम्मीद की किरण उस समय दिखाई दी जब उस वक्त के पदस्थापित मत्स्य पदाधिकारी श्री मनीष कुमार श्रीवास्तव, वत्र्तमान में जिला मत्स्य पदाधिकारी ने उन्हें इस चंवर भूमि में मत्स्य पालन की व्यापक संभावनाएंे बताई। बाद में श्री श्रीवास्तव के द्वारा पूरे क्षेत्र का सघन दौरा एवं निरीक्षण कुमार राकेश के टोली के साथ किया गया। उन्हें इस बात से घोर आश्चर्य और अफसोस हुआ कि मत्स्य पालन की दृष्टिकोण से इस उत्कृष्ट क्षेत्र का उपयोग अब तक मत्स्य पालन हेतु क्येां नहीं हआ ? उसी दिन श्री श्रीवास्तव के अगुआयी में इस टीम के बेरोजगर युवकों ने प्रण किया की इस क्षेत्र का नाम मत्स्य पालन में पूरे बिहार ही नहीं वरन् भारत के मानचित्र पर लाएगें।
इसकी शुरूआत श्री राकेश के पुश्तैनी भूमि से प्रारंभ हुई जो वर्षाें से बेकार पड़ी थी, जहां सिर्फ खरपतवार ही पैदा हुआ करते थे। जोशिले नवजवानों ने किराए पर ट्रैक्टर एवं आपसी चंदे से डीजल भरवाया तथा स्वयं मत्स्य विभाग की देख-रेख में कार्य प्रारंभ किया। महीने भर में ही दो एकड़ चंवर भूमि को तालाब में तब्दील कर दिया गया। बरसात में बारिश के पानी एवं बहाव के पानी से तालाब मत्स्य पालन हेतु तैयार हो गया तथा वैज्ञानिक ढं़ग से प्रथम वर्ष में मत्स्य पालन का कार्य प्रारंभ किया गया। मेहनत और लगन से इन बेरोजगार युवकों के चेहरे उस उक्त खिल उठे जब मत्स्य शिकारमाही शुरू हुई और प्रथम वर्ष में ही इस टाीम ने मुनाफा लगभग 50,000 रू0 का किया। इस लाभ ने न केवल उत्साहित टीम को एक दिशा और रोजगार दिया वरन् पूरे क्षेत्रवासियों को रोजगार का एक नया आयाम भी प्रदान किया। उन्होने इस Waste Wet Land से कभी इस तरह के रोजगारेन्मुखी उपयोग के बारे में सोचा भी न था। दूसरे वर्ष इस टीम ने श्री राकेश के आस-पास के कुछ 10 एकड़ जलमग्न भूमि को इस कार्य हेतु चुना तथा संबंधित भू-स्वामियों से इस संदर्भ में बात-चीत की। उनसे 10 से 20 वर्षों का निबंधित एकरारनामा एक निश्चित वार्षिक लगान पर किया। उनकी भूमि पर उनके जमीन के टुकड़ों के अनुरूप तालाब बनाना प्रारंभ किया गया तथा वर्ष के अन्त तक टीम के पास कुल 5 तालाब 7 एकड़ के हो गए।
इन तालाबों से प्राप्त लाभ का एक अंश ये युवक अपने रोजाना के खर्चें के रूप में निकाल कर शेष सारा लाभांश तालाब निर्माण एवं भूमि लीज पर लेने में खर्च करने लगे। यह प्रक्रिया निरंतर 6 वर्षों तक अनवरत् चलती रही और आज इस टीम ने जो समना देखा था वो पूरा हुआ। आज की तारीख में इस टीम ने अपनी एक फाॅर्म बना ली जिसका नाम दिया ‘‘परविका’’ जिसका शाब्दिक अर्थ चंद्रमा के तहत सुदर होता हैै। चित्र दृ ३ सचमुच यह परियोजना चंद्रमा के तरह ही सुंदर उभर कर आया है इस फर्म ने अपने झोली में लगभग 100 एकड़ की भूमि में 75 एकड़ जलक्षेत्र का तालाब होने का गौरव हासिल किया है।
इन तालाबों में संचयन हेतु बहुत ही ज्यादा मत्स्य बीज की आवश्यकता महसूस की गई, जिसकी आपूर्ति आस-पास के क्षेत्रों एवं उत्तरप्रदेश से की जाने लगी, किन्तु बीज की गुणवता, वाहन खर्चे, तथा रास्ते में बीज के व्यापक रूप से नुकसान हो जाने के कारण श्री श्रीवास्तव ने उन्हे मत्स्य बीज उत्पादन संयत्र (हैचरी) लगाने की सलाह दी। इस संर्दभ में उनके पहल पर विभागीय अभियंताओं द्वारा हैचरी का प्राकलन तैयार किया तथा पंजाब नेशनल बैंक, भिठ्ठी को वित्त पोषण हेतु भेज दिया ।
परियोजना के प्राकलन से संतुष्ट बैंक ने 13.75 लाख का ऋण स्वीकृत किया । फलतः देखते ही देखते मत्स्य विभाग की देख-रेख में एक मत्स्य बीज हैचरी तैयार हो गई जिसने अपने प्रथम चक्र में ही 100ः उत्पादन दिया।
चित्र ८ इस सार्थक प्रयास का व्यापक प्रचार प्रसार हुआ और तत्कालिन जिलाधिकारी श्री लोकेश कुमार जी के द्वारा भी इसका अवलोकन किया गया तथा इस माॅडल को माननीय मुख्यमंत्री के सेवा यात्रा के दौरान दिखाए जाने का प्रस्ताव दिया गया, जिसे माननीय मुख्यमंत्री जी के कार्यालय द्वारा सहर्ष स्वीकार किया गया। माननीय मुख्यमंत्री जी के द्वारा नए हैचरी का उद्घाटन एवं श्री राकेश को परियोजना स्थल पर ही अनुदान की राशि दी गई। उनके द्वारा पूरे परियोजना की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई तथा पूरे टीम को आर्शीवचन दिया गया साथ ही सम्र्पूण क्षेत्र को विकसित कर इन्द्रधनुषीय क्रांति रूपी संज्ञा को सार्थक करने की अपील की गई।
आज यह माॅडल ने पूरे प्रदेश मे ही नहीं वरन राष्ट्रिय स्तर पर अपनी पहचान बना ली है। जिससे न केवल इन बेरोजगारो को लाखों का आय प्राप्त हो रहा है, वरन् कई अन्य व्यक्तियों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिल रहा है। इसे देखने भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के वरिष्ट अधिकारी एवं वैज्ञानिक आए, साथ में ICAR  के वैज्ञानिकों ने भी इसका निरीक्षण किया। माननीय मंत्री पशु एवं मत्स्य संसाधन श्री गिरिराज सिंह द्वारा भी समय-समय पर इस परियोजना पर आकर मार्गदर्शन एवं आर्शीवाद दिया गया है जो बहुत दी सार्थक एवं उत्पे्ररक रहा है।
 
इनके अलावा उतरप्रदेश सरकार के अधिकारी भी माॅडल को देखने एवं इसका अनुशरण करने के उद्देश्य से आए। मात्स्यिकी के क्षेत्र में अग्रणी राष्ट्रिय मात्स्यिकी विकास वोर्ड द्वारा भी कई बार अधिकारियों का भ्रमण कार्यक्रम यहाॅ हुआ है। मत्स्य निरेशलय के निदेशक श्री निशंात अहमद जी के द्वारा भविष्य में इस माडल को एक व्यापक स्वरूप प्रदान करने हेतु जिला मत्स्य पदाधिकारी को समय स्मय पर परियोजना स्थल पर आकर निर्देश एवं मार्गदर्शन प्रदान किया गया है। वर्तमान जिलाधिकारी महोदय के द्वारा अपने दूरदृष्टि से इस परियोजना को एक नया आयाम देने की कोशिश की गई है। आदरणीण जिला पदाधिकारी के परियोजना स्थल के निरीक्षण के दौरान इसे ।ुनं ज्वनतपेउ (पर्यटन) के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया है।
इस क्रम में जिला मत्स्य पदाधिकारी के द्वारा प्राप्त निदेश के आलोक में पहल की गई है, तथा प्रथम चरण में हैचरी के समीप एक रसोई का निर्माण कार्य पूर्ण किया गया है। जहां पर्यटक को वाजिव दाम स्वस्थ, ताजी एवं स्वादिष्ट मछली उपलब्ध होगी। साथ ही नौका बिहार हेतु प्रयास किया जा रहा है। यह प्रयास सचमूच सराहनीय एवं अन्य संबंधित क्षेत्र में अनुशरणीय है जो बेरोजगार युवको को केवल रोजगार मुहैया ही नहीं कराएगा वरन् स्थानीय लोगो का पलायन रोकते हुए अपने जिला को विकसित समृद्व एवं स्वस्थ जिले के क्रम में भी लाएगा। आइए मिलकर बनाए एक बेहतर, स्वस्थ और समृद्व सिवान।

धन्यवाद जिला मत्स्य पदाधिकारी -ः सह:- मुख्य कार्यापालक पदाधिकारी सिवान।